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यदि नहीं होतीं अमृता जी

अपने आत्मपरिचय में अमृता जी लिखती हैं: “एक दर्द था- जो सिगरेट की तरह मैंने चुपचाप पिया है सिर्फ कुछ नज़्मे  हैं जो सिगरेट  से मैंने राख की तरह झाडी हैं” लेकिन मुझे लगता है कि वो ज़िंदगी के दरगाह पर जलने वाली  अगरबत्ती थीं  जिसकी खुशबू  बुझ जाने के बाद  रहती है और जिसकी राख […]

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वैलेंटाइन डे के बहाने

  अभी मैंने किसी फिल्म में नायिका को नायक से कहते  सुना: I think I like you. No I guess,  I love you.  बाला कुछ  महसूस   तो कर रही पर क्या  है ये अहसास , इसे कोई नाम देने में दिक्कत महसूस कर  रही है.  कुछ तो हुआ है, कुछ हो गया है. ये  पसंद […]

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बंद हो जाना  एक रोशनदान का

अपनी एक ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार ने  बुज़ुर्गों को अँधेरी कोठरी का  रोशनदान  कहा था. निदा फ़ाज़ली के वफ़ात से मुझे  ऐसा  लग रहा है जैसे हमारे मुल्क के चंद   रोशनदानों में   से एक बंद हो गया हो. कहीं कुछ बुझ गया हो जैसे।  हिन्दुस्तान की हिन्दुस्तानियत कुछ कम हो गई हो जैसे. मानो अज़ान […]

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बंधु इस नए साल में !!

काल के विशाल वट वृक्ष से एक सूखा पत्ता बस अब किसी भी पल गिरने ही वाला है.  वर्षांत समीप है या यूँ कहें कि नवागन्तुक के स्वागतार्थ वंदनवार सज चुके है. नव वर्ष के आगमन की उद्घोषणा करती तूर्यध्वनि बस श्रवणेंद्रियों पर दस्तक देनी ही वाली है. ऐसी बेला में यह स्वाभाविक है कि […]

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गैर से नफरत जो पाली…

जिन पाठकों को ग़ज़लों का शौक़ है उन्होंने फरीदा जी की दिलकश आवाज़ में फैज़ साहब की रचना ” तुम आये हो न शबे इंतज़ार गुज़री है” ज़रूर सुनी होगी. जब से आमिर खान  वाला मामला उठा है तब से इस ग़ज़ल का  ये शेर मेरे जेहन में बार बार आरहा है: वो बात सारे  […]

Cascading down or diluting down? Read more

Cascading down or diluting down?

“If I had six hours to chop down a tree, I’d spend the first four hours sharpening the axe.”   This quote from Abraham Lincoln emphasizes that inefficient tools waste our time and energy and it is better to spend most of our time finding and cultivating the best tools for any task.  Attending training […]

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बरसात: चन्द ख़यालात

बरसात 1 एक साथ आते हैं कई विचार, अचानक – ना जाने कहाँ से ! कैसे सम्भालूं इनको ? कैसे सहेजू इनको ? क्या करती है धरती जब उसे पर एक साथ गिरती हैं लाखों बूँदें ??! बरसात 2 ज़ेहन की ज़मीन पर यादों की हल्की बारिश लगातार – एक काई सी जम जाती है […]

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From a passive cynicism to an active hope

The other day someone posted on his Facebook timeline: Development is an 11 letter joke- the smallest and the cruelest. Someone else commented: No, Development is not, Democracy is the one -just 9 letters!! I am sure, quite a few of you may share the brazen cynicism encapsulated in these sentences. They do capture reality […]