शरद की चाँदनी

दूध मे धोई हुई सी, यह शरद की चाँदनी है .

खुद मे हीं खोई हुई सी, यह शरद की चाँदनी है

 

हृदय मे नव- भाव उठते, राग उठते, ताल उठते ,

मधुर छंदों  की परी सी, यह शरद की चाँदनी है

 

ग्रंथि- बंधन  नष्ट कर, सब दायरों को लाँघ, आओ

आ, कि हंस हंस कर बुलाती, यह शरद की चाँदनी है.

 

रात चुप है, वात चुप है, फूल चुप हैं पात चुप है

मोहिनी वीणा बजाती , यह शरद की चाँदनी है.

 

आईने के सामने झुक कर ज़रा बैठी हुई तुम,

झील मे तकती खड़ी सी, यह शरद की चाँदनी है.

 

उफ्फ ये कीलन, उफ्फ ये मारण, मौन- मुखरित- मदिर- मूर्छा,

कमनीय  हत्यारिणी सी, यह शरद की चाँदनी है.

 

काश मैं भी चाँदनी सा, निखर पाता बिखर पाता,

स्नेहमय-वरदायिनी सी यह शरद की चाँदनी है.

 

काश ये चंदा न डूबे मैं भी यूँ बैठा रहूं ,

पर भला के है ये संभव ? यह शरद की चाँदनी है.

 

4 thoughts on “शरद की चाँदनी

  • Sanjeev Tapyal

    on

    Bahut khoob!!!…as usual.

  • Arti Chandel

    on

    भाव अनगित मन में जगाती, यह शरद की चांदनी है
    बात बिसरी हमें बतलाती, यह शरद की चांदनी है।

  • कुछ गजब सा है –मेरे घर की चार दीवारी के पार-
    नुकीले पहाड़ों की बाढ़ से -झांकता चाँद..
    मत पूछो सुबह – दूब की ओस में चमकती
    ये गाँव की चांदनी है !

    क्या गजब – लिखा सचिन – बहुत खूब!

  • Priyanka

    on

    Beautiful poem…

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