वैलेंटाइन डे के बहाने

 

अभी मैंने किसी फिल्म में नायिका को नायक से कहते  सुना: I think I like you. No I guess,  I love you.  बाला कुछ  महसूस   तो कर रही पर क्या  है ये अहसास , इसे कोई नाम देने में दिक्कत महसूस कर  रही है.  कुछ तो हुआ है, कुछ हो गया है. ये  पसंद है या  प्रेम? क्या पसंद और प्रेम एक ही है या अलग? क्या पसंद प्रेम की पहली सीढ़ी है या प्रेम पसंद के आवरण में छिपा छलिया? प्रेम पर बहुत कुछ सोचा, समझा लिखा गया है और विषय में मेरी कोई विशेषज्ञता भी नही है। किन्तु फिल्म में ये संवाद सुन कर  लगा कि पसंद और प्रेम के अंतर पर चर्चा समयानुकूल होगा। आप पूछेंगे आज ये चर्चा क्यूँ ? तो मित्रों,  “लाख गाफिल ही सही, इतने भी अनजान नही”. मुझे भी पता है कि आज बाज़ार जनित, व्यापर उत्प्रेरित, मीडिया संपोषित आधुनिक प्रेम का महापर्व वैलेंटाइन डे है जो कि अब रोज डे प्रोपोज़ डे जैसे पावन दिवसों के रूप में सप्तरात्रि उत्सव का रूप ले चुका है.

मुझे आज से 20 वर्ष पहले धुले महाराष्ट्र में एक कांफ्रेंस के समापन सत्र में एक वक्ता द्वारा समझाए गए liking और loving के अंतर की बात याद आ गयी।उन्होने कहा कि इन दो शब्दों के इस्तेमाल को देखें. जब हम पसंद की बात करते हैं तो कहतें हैं कि I like him/her because s/he is good looking, slim, intelligent, caring etc. अर्थात जब हम पसंद की बात करते हैं तो गुणों की बात करते हैं. लेकिन जब हम प्रेम की बात करते हैं तो कहते हैं I love him/her despite s/he is touchy, insensitive, average looking etc. ये जो अंतर है न due to और despite का, इसी मे सारा खेल है, यदि आप अभी भी गुण-प्रशंसा मे अटके है तो अभी तक आप  पसंद के स्तर पर हैं पर यदि  आपको कमियाँ और  अपूर्णताएँ दिखने  लगी हैं,  आपने व्यक्तिविशेष को फिर भी स्वीकार किया है, बेशर्त- तो ये प्रेम हैं. वैसे प्रेम क्या है इस पर गहन विवेचनाएँ उपलब्ध हैं. पर यह क्या है कोई नही जानता है. एक हाथी और छह अंधों वाली कथा की तरह किसी को नही पता. अपने अपने व्यक्तिगत अनुभव से इसे व्याख्यायित करने के असंख्य प्रयत्न हुए हैं.  प्रेम पर होने वाली आध्यात्मिक और काव्यात्मक   चर्चाएँ बहुधा जीवन को दिशा देने मे असमर्थ होती हैं. प्रेम के सन्दर्भ मे व्यवहारिक सूत्र मैने कई स्त्रोतों से सीखे हैं, पर दो पुस्तकों के ज़िक्र का लोभ संवरण नही हो पा रहा है-एक किताब हैं M Scott Peck की  The Road Less Travelled और Eric Fromm की The Art of Loving. Scott Peck प्रेम को अनुभूति नही क्रिया मानते हैं “Love is the will to extend one’s self for the purpose of nurturing one’s own or another’s spiritual growth…जबकि फ्रॉम प्रेम को कला मानते हैं जिसके लिए जानकारी, प्रयास, समर्पण और अनुशासन की आवश्यकता होती हैं.  ये दोनो पुस्तकें इंटरनेट पर उपलब्ध हैं. यदि आप चाहें तो इनके soft version मैं mail कर सकता हूँ.

वैलेंटाइन डे जैसे अवसरों मे विश्वास रखें या न रखें ऐसे दिवस आत्म निरीक्षण के अवसर तो देते हीं हैं.  मैने कहीं पढ़ा था:

“When you like a flower, you just pluck it.   

But when you love a flower, you water it daily.”

आपका आवाहन करता हूँ कि आत्मावलोकन करे सभी संबंधो के बारे में और सोचें कि हम फूल तोड़ने मे लगें हैं या पौधे को पानी देने मे – एक  exploitative relationship मे हैं या nurturing relationship  मे . इधर व्‍यक्तियो को पसंद करने और  वस्तुओं से प्रेम करने का चलन बढ़ता जा रहा है. ज़रा सोचें हम क्या कर रहे हैं? हमें भी तो नही  लग गया ये रोग? काश जिंदगी के कंप्यूटर मे love all का default option होता!

……आज जब लोग

प्रेम के लिए

नही निकाल पा रहे

हैं समय

मैने समय के लिए

प्रेम का इंतज़ाम करने की

की है गुस्ताख़ी

और उठा ली है कलम…..

4 thoughts on “वैलेंटाइन डे के बहाने

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