यदि नहीं होतीं अमृता जी

अपने आत्मपरिचय में अमृता जी लिखती हैं:

“एक दर्द था-

जो सिगरेट की तरह मैंने चुपचाप पिया है

सिर्फ कुछ नज़्मे  हैं

जो सिगरेट  से मैंने राख की तरह झाडी हैं”

लेकिन मुझे लगता है कि वो ज़िंदगी के दरगाह पर जलने वाली  अगरबत्ती थीं  जिसकी खुशबू  बुझ जाने के बाद  रहती है और जिसकी राख नहीं बनती, बनता है  भभूत जिसे   लगा कर शायरों, कविओं की अनंत पीढ़ियां ऊर्जस्वित होती रहेंगी.

तो यदि नहीं होतीं अमृता जी तो क्या होता?

शायद कुछ नहीं

बस

चाँद कुछ मद्धम होता

फूलों की खुशबू  हो गयी होती थोड़ी कम

आकाश होता  कुछ कम नीला

इश्क़ होता कुछ उदास सा

और शायरी होती बदहवास.

मेरा  अमृता जी से परिचय उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट पढ़ने  के  साथ हुआ. मैं चमत्कृत था कि ऐसा भी व्यक्ति होता है कोई? ऐसा भी जीवन हो सकता है  किसी का? फिर मिली मुझे उनकी कविताओं  की किताब ज्ञानपीठ  से प्रकाशित ,  पंजाबी-हिंदी में अपने विद्यालय के पुस्तकालय में और मैं मुरीद हो गया उस कलम का जिसने इंद्रधनुष घोल रखी थी अपनी स्याही में, उन आँखों का जिनकी  दृष्टि की तीव्रता से  एक्स किरणे भी  रश्क करती थीं. आज उनकी यौमे पैदाइश पर स्कूल के दिनों की डायरी से  से कुछ नज़्मे आज आपके साथ बांटने का मन कर रहा है जिस से आप ये भी समझ जायेंगे की यदि नहीं होती अमृता जी तो क्या नहीं होता.

यदि नहीं होतीं अमृता जी मैं कभी नहीं जान पता उस उत्सव के बारे में जो सृष्टि में अहर्निश मनाया जा रहा है. कुछ पंक्तियाँ उनकी नज़्म ‘दावत ‘ से.

रात-कुड़ी ने दावत दी
सितारों के चावल फटक कर
यह देग किसने चढ़ा दी

चाँद की सुराही कौन लाया
चाँदनी की शराब पीकर
आकाश की आँखें गहरा गयीं

धरती का दिल धड़क रहा है
सुना है आज टहनियों के घर
फूल मेहमान हुए हैं

क़िस्मत ने एक नग़मा लिखा है
कहते हैं कोई आज रात
वही नग़मा गायेगा

कल्प-वृक्ष की छाँव में बैठकर
कामधेनु के छलके दूध से
किसने आज तक दोहनी भरी !

हवा की आहें कौन सुने,
चलूँ, आज मुझे
तक़दीर बुलाने आई है…

एक बेरहम और सहमे हुए वक़्त में जब सब कुछ होता है खामोश और कोई लिखता है प्रतिरोध का गीत तो अमृता जी की कविता “चुप की साज़िश” याद आती है:

रात ऊँघ रही है…
किसी ने इन्सान की
छाती में सेंध लगाई है
हर चोरी से भयानक
यह सपनों की चोरी है।

चोरी के निशान —
हर देश के हर शहर की
हर सड़क पर बैठे हैं
पर कोई आँख देखती नहीं,
न चौंकती है।
सिर्फ़ एक कुत्ते की तरह
एक ज़ंजीर से बँधी
किसी वक़्त किसी की
कोई नज़्म भौंकती है।

उनकी कविता सांसारिक प्रेम और आध्यात्मिक /दैवीय प्रेम के द्वंद्व को ध्वस्त करती है. उनकी कविता में स्थूल कब वायव्य हो जाता है और वायव्य कब आकार ग्रहण कर लेता है पता ही नहीं चलता है. उनकी एक कविता श्रृंखला है जिनके कविताओं के  नाम हैं: आदिपुस्तक , आदि रचना , आदि चित्र, आदि संगीत, आदि धर्म , आदि कबीला , आदि स्मृति.    जब मैंने पहली बार पढ़ी थी  समझ में नहीं आया था, पर अब जितनी  बार इसे पढता हूँ,  नए नए अर्थ उभरते चलते जाते हैं.  इस कविता श्रृंखला  में “मैं” और “तुम” के अन्तर्सम्बन्ध अपने  गहनतम, प्रग़ाढ़तम रूप में  अभिव्यक्त हैं. जी करता है कि सारी कविताएं आप के साथ बांटू पर फिर कभी. अभी सिर्फ तीन.

आदि-रचना

मैं  थी- और शायद तू  भी…

शायद एक साँस के फ़ासले पर खड़ा

शायद एक नज़र के अंधेरे पे बैठा

शायद एहसास के एक मोड़ पर चल रहा

पर वह पुरा-ऐतिहासिक काल की बात है

यह मेरा और तेरा अस्तित्व था

जो दुनिया  की आदि भाषा बना

मैं  की पहचान के अक्षर बने

और उन्होने

आदि भाषा की आदि पुस्तक लिखी

यह मेरा और तेरा मिलन था

हम पत्थर की सेज पे सोए

और आँखें , होंठ, उंगलियाँ, पोर

मेरे और तेरे बदन के अक्षर बने

और उन्होने

उस आदि-पुस्तक का अनुवाद किया

ऋग्वेद की रचना

तो बहुत बाद की बात है

 

आदि संगीत

मैं  थी- और शायद तू  भी…

एक असीम खामोशी थी

जो सूखे पत्तों की तरह झरती

या यूँ  ही किनारों की रेत की तरह घुलती

पर वह पुरा-ऐतिहासिक काल की बात है

में ने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी

और जब तूने पलट कर आवाज़ दी

तो हवाओं के गले में कुछ  थरथराया

मिट्टी के कण  कुछ सरसराए

और नदी का पानी कुछ  गुनगुनाया

पेड़ की टहनियाँ कुछ  कस सी गईं

पत्तों में से एक झंकार उठी

फूलों की कोंपल ने आँख झपकाई

और एक चिड़िया के पंख हिले

यह पहला नाद था

जो कानों ने सुना था

सप्त सुरों की संज्ञा

तो बहुत बाद की बात है…

आदि धर्म

मैंने  जब तू को पहना

तो दोनो के बदन अंतर्ध्यान थे

अंग फूलों की तरह गूँथे गये

और रूह की दरगाह पर

अर्पित हो गये…

तू और मैं  हवन की अग्नि

तू  और मैं  सुगंधित सामग्री

एक दूसरे का नाम होठों  से निकला

तो वही नाम पूजा के मन्त्र  थे,

यह तेरे और मेरे

अस्तित्व का एक यज्ञ था

धर्म-कर्म की कथा

तो बहुत बाद की बात है…

 

उनकी एक और कविता श्रृंखला  याद आती है “नौ सपने” जो मातृत्व के नौ महीने खूबसूरती से दर्ज करती हैं. यदि नहीं होतीं अमृता जी तो हम जैसे लोग कैसे जान पाते उस अनुभूति को. प्रस्तुत है दूसरा सपना:

फागुन की कटोरी में सात रंग घोलूँ
मुख से न बोलूँ

यह मिट्टी की देह सार्थक होती
जब कोख में कोई नींड़ बनाता है

यह कैसा जप? कैसा तप?

कि माँ को ईश्वर का दीदार
कोख में होता…

जी करता है आज कि बस  सुनाता जाऊं  आप को पर रुकना तो पड़ेगा ही. बस एक कविता और: एक खत जो खतरनाक रूप से प्रासंगिक है: .

एक खत

चाँद-सूरज दो दावतें

कलम ने डोबा लिया

लिखतम तमाम धरती पढ़तम तमाम लोग

साइंसदानों, दोस्तों!

गोलियों, बन्दूकें  और एटम बम बनाने से पहले

इस खत को पढ़ लेना

हुक्मरानों, दोस्तों !

गोलियों, बन्दूकें  और एटम बम चलाने से पहले

इस खत को पढ़ लेना

सितारों के हरफ़ और किरणों की बोली अगर पढ़नी नहीं आती

किसी आशिक़- अदीब से पढ़वा लेना अपने किसी महबूब से पढवा लेना

और शख्स की यह मातृबोली है तुम बैठ जाना किसी भी ठाँव

और  खत  पढवा लेना किसी की माँ से

फिर आना और मिलना क़ि मुल्क की हद जहाँ है

एक हद मुल्क  की

और नाप कर देखो

एक हद इल्म की

एक हद इश्क़ की

और फिर बताना कि किसकी हद कहाँ है

चाँद-सूरज दो दावतें

हाथ में एक कलम लो

इस खत का जवाब दो

और दुनिया की खैर खैरियत के दो हरफ़ भी डाल दो

तुम्हारी अपनी धरती

तुम्हारे खत की राह देखते बहुत फिक्र कर रही…….

 

सचमुच, जब तक चाँद, फूल, आसमान, इश्क़ और शायरी है तब तक अमृता जी हैं. और यदि ये नहीं भी हुए तो उनकी नज़्मों को जोड़ कर फिर से बना लेंगे हम-चाँद, फूल,आसमान, इश्क़ और शायरी!!

3 thoughts on “यदि नहीं होतीं अमृता जी

  • सत्यदीप

    on

    सच सचिन जी,
    आप जब भी कुछ लिखते हैं, मीठा सा कुछ हो जाता है
    टूटे पेड़ में नई कोपलें खिल जाती हैं
    मुरझाती टहनी में कोई नया पत्ता खिल उठता है

  • सीमा हस्तु

    on

    अमृता प्रीतम को पढ़ना आनंद है और उनके बारे में इस तरह की कोई श्रद्धांजलि पढ़ना एक अलग ही दर्जे का आनंद। रसीदी टिकट ने पहचान करवाई एक ऐसी लेखिका से जिसकी लेखनी अपने समकक्ष लेखकों से अलग थी। ये एक ऐसा अनुभव था जो शब्दों में व्यक्त कर पाना मेरे जैसों के लिए आसान नहीं होगा। आपकी इस श्रद्धांजलि में एक सुमन मेरे नाम का भी जोड़ लीजिये।
    अज्ज आखां वारिस शाह नू
    किते कब्रां विचों बोल
    अज्ज किताबे इश्क़ डा कोई अगला वरका खोल
    इक्क धी रोई पंजाब दी
    तू लिख लिख मारे मेण
    अज्ज लक्खां तियां रोन्दियां तैनू वारिस शाह नू केहण

  • Ruchita

    on

    Amrita ji ke toh sabhie kayal hai…. par unki writings ko aaj jitna khoobsurti se samjha hai shayad pehle kabhie nahi samajh paaye……Sachin you sud write more often…. its like a flow of river…… beautiful

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