बंद हो जाना  एक रोशनदान का

अपनी एक ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार ने  बुज़ुर्गों को अँधेरी कोठरी का  रोशनदान  कहा था. निदा फ़ाज़ली के वफ़ात से मुझे  ऐसा  लग रहा है जैसे हमारे मुल्क के चंद   रोशनदानों में   से एक बंद हो गया हो. कहीं कुछ बुझ गया हो जैसे।  हिन्दुस्तान की हिन्दुस्तानियत कुछ कम हो गई हो जैसे. मानो अज़ान और  आरती के मिलन से जनम लेने वाला स्वर्गिक संगीत कुछ मंद  पड़ गया हो.  मुझे उनकी  नज़्म “वालिद की वफ़ात पे” याद  आ रही है और उन्ही से शब्द उधार लेकर कहने का मन हो रहा है :

मुझे मालूम था

 तुम मर नहीं सकते

तुम्हारे मौत की

सच्ची खबर जिसने उड़ाई थी

 वो झूठा था

क्यों लगता है मुझे कि निदा मर नहीं सकते। एक तो इसका cliched उत्तर हो सकता है कि अपनी रचनाओं में वो हमेशा जिन्दा रहेंगे।  किन्तु मेरा कारण नितांत निजी और वैयक्तिक  है. मैं किसी शायर, किसी कवि, किसी नग्मानिगार की अहमियत इस बात से तय करता हूँ कि वो  आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे कितना शामिल है. अपनी उक्तिवैचित्र्य, अपने शब्द्चातुर्य से तो कई लोग प्रभावित करते हैं किंतु बहुत कम शब्दशिल्पी ऐसे हैं जो आपकी ज़िंदगी के अभिन्न अंग बन जाते हैं , आपकी  मांस-मज्जा मे प्रवेश कर जाते हैं. निदा ऐसे ही शायर थे जिनकी पंक्तियाँ कभी भी, कहीं पर भी याद आ जाती हैं- कभी हमारे इरादे  मजबूत करती हुई, कभी रास्ता दिखाती हुई, कभी झंझोड़ती हुई, कभी किसी छूट गये रिश्ते की याद दिलाती हुई,  कभी किसी टूट गये रिश्तों को जोड़ती हुई, कभी नये रिश्ते बनाती हुई. इस पल उनके इतने अशआर , इतने   दोहे, इतनी नज़्में   एक साथ याद आ रहीं की मैं ये तय नहीं कर पा रहा हूँ आपसे क्या साझा करूँ क्या नहीं. चलिए, ऐसा करता हूँ की उनकी कुछ ऐसी पंक्तियाँ बाँटता हूँ आपके साथ जिसने मेरे जीवन,  मेरी सोच को गहराई के साथ प्रभावित  किया है.

जब भी हम समस्याग्रस्त होते हैं, समाधान  के लिए प्रयास करने के बजाय  उस समस्या के लिए जिम्मेवार  लोगों को कोसने लग जाते हैं ये जानते हुए भी कि इस से हमारी  समस्या के समाधान में कोई मदद नहीं मिलने वाली.  ऐसे पल मुझे याद आता है:

रस्ते को भी दोष दे आँखें  भी कर लाल 

चप्पल में जो कील है पहले उसे निकाल

जब माज़ी के घाव टीसने लगते हैं तब जी में आता है:

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नही जाता

जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता

जब भी अकादमिक मजबूरियों की वजह से मैं अपने आप को किताबों मे डूबा पाता  हूँ,  घर के बुज़ुर्ग की तरह निदा मेरे  कान पकड़ते हैं और कहते हैं:

धूप मे निकलो, घटाओं मे नहा कर देखो

ज़िंदगी क्या है, किताबों को हटा कर देखो

जब लोगों को हर वक़्त  रोते देखता हूँ तब मन में आता है:

अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम

हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है 

और फिर अक्सर ये महसूस किया है कि:

गम और खुशी दोनो कुछ देर के साथी हैं

फिर रस्ता ही रस्ता है खोना हैं न पाना है 

और जब कभी अस्वीकार और प्रतिरोध का भाव उठता है और हिम्मत नहीं होती तब ये शेर सहारा देता है:

हरेक बात को चुपचाप क्यों सुना  जाए

 कभी तो हौसला करके ‘नहीं’ कहा जाए 

जब अभिवावकों को पढाई के लिए बच्चों के पीछे ज़रुरत से ज्यादा पड़ता देखता हूँ तो कहता हूँ:

 बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो

चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे 

जब लोग हर बात मे ” जो  भगवान की इच्छा”  कहते हैं तो ये कहने का मन  करता है:

खुदा के हाथ मे मत सौंप सारे कामों को

बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख्तियार भी रख.

हिंदी कवि  विष्णु नागर ने कहीं लिखा है कि  सबसे अच्छी कविता इतने दुखोँ में काम आएगी कि लिखी हुई  नहीं लगेगी . इस निकष पर निदा की कविता दरहक़ीक़त बेहतरीन कविता लगती है क्योंकि उनकी पंक्तियाँ अक्सर लिखी हुई नहीं लगती. पढ़ कर ऐसा लगता है मैने ये जाना की गोया यह भी मेरे दिल मे है.

जब उनके इंतकाल की खबर सुनी तो उनका एक शेर याद आया:

जाने वालों से राब्ता रखना

दोस्तों! रस्मे-फातिहा रखना

निदा साहब!आपका कोई शैदाई आपसे राब्ता तोड़ना भी चाहे तो कैसे  तोड़े. मस्जिद के रास्ते मे किसी रोते हुए बच्चे को हंसाने का ख्याल जब भी आएगा , आप वहाँ होंगे .  जब भी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलने का ख्याल आएगा आप वहाँ होगे. किसी को भी मोहब्बत मे हरेक चीज़ अपनी जगह ठिकाने पे मिलेगी और ज़माने से कोई शिकायत नहीं होगी आप वहाँ होंगे. जब तक प्यासी धरती को पानी, बच्चों को गुड़धानी, घरों को दिए और अनाज की ज़रूरत रहेगी तब तक आप रहेंगे. जब तक मेरे रोने पर मेरी माँ  को बिन चिठी बिन तार मेरे दुःख का पता चलता रहेगा तब तक आप रहेंगे. जब तक हम चलते, गिरते, सम्हलते और लम्हा लम्हा बदलते रहेंगे, तब तक निदा की निदा (voice) हमारे साथ रहेगी।   आपसे जो राब्ता है वो भला कैसे टूटेगा क्यूंकि आपके ही शब्दों में कहूँ तो :

तुम ये कैसे जुदा हो गए

हर तरफ हर जगह हो गए.

दिनकर ने कभी था:

बड़ी कविता जो इस भूमि को सुन्दर बनाती है

बड़ा वह ज्ञान जिस से व्यर्थ की चिंता नहीं होती

बड़ा वह आदमी जो ज़िंदगी भर काम करता है

बड़ी वह रूह जो रोये बिना तन से निकलती है

एक कद्दावर इंसान , एक बेमिसाल शायर,  एक ज़हीन दानिशवर,  एक मुसल्लम तहज़ीब का जाना है निदा का जाना . मेरे लिए घर के बुज़ुर्ग का जाना है निदा का जाना जिनके  अल्फ़ाज़ के धागों से बुनी है मैने एक नर्म, मुअत्तर सी रिदा बुनी है जिसे ओढ़-बिछा  कर सर्दी-गर्मी कट जायेगी. जिनके अशआर की रौशनी मेरी राहों को रौशन करती रहेगी.

अंत में ज़ौक़ साहब से मिसरा उधार लेकर कहना चाहूंगा:

कहते हैं आज ज़ौक़ जहाँ से गुज़र गया

क्या खूब आदमी था खुदा मगफिरत करे

आमीन!

 

 

 

3 thoughts on “बंद हो जाना  एक रोशनदान का

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