गैर से नफरत जो पाली…

जिन पाठकों को ग़ज़लों का शौक़ है उन्होंने फरीदा जी की दिलकश आवाज़ में फैज़ साहब की रचना ” तुम आये हो न शबे इंतज़ार गुज़री है” ज़रूर सुनी होगी. जब से आमिर खान  वाला मामला उठा है तब से इस ग़ज़ल का  ये शेर मेरे जेहन में बार बार आरहा है:

वो बात सारे  फ़साने में जिसका ज़िक्र न था.

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है.

बहरहाल अधिकतर लोगों को बात नागवार लगी और कुछ लोगों को नहीं भी लगी. पक्ष और प्रतिपक्ष  में तर्कों -कुतर्कों का दौर चला. तिनके का झाड़, तिल का ताड़ और राई का पहाड़ कैसे बनता है , यह घटना इन मुहावरों के उत्तम उदाहरण हैं. मीडिया ने तो इन मुहावरों को एक और अतिरंजित स्वरूप प्रदान किया। बिना तिल के ताड़ और बिना राई का पहाड़ कैसे बनाया जा सकता है ये स्पष्ट हो गया. कौन दोषी है -आमिर, मीडिया या बिना तथ्यों को जाँचे देशभक्ति के दौरे (या दस्त!!) से  पीड़ित सोशल मीडिया के शैदाई जो बहुसंख्या के अंधमत के समर्थन में प्रतिक्रिया देने को सदैव तत्पर रहते हैं. इस प्रश्न पर चर्चाएं चल रहीं हैं और चलती रहेंगी. इस पोस्ट का उद्देश्य पिष्टपेषण कतई नहीं है. मुझे इस पूरे प्रकरण में जिस बात ने सर्वाधिक आहत  किया वह है मानव मन में दबे असीम घृणा का अभूतपूर्व प्रदर्शन- नफरत का उमड़ता सैलाब. या यूँ कहें कि एक   प्रतियोगिता आरम्भ हो गई-कौन आमिर को कितना   नीचे दिखा सकता है. फेसबुक पर वायरल हुए कई घृणित ग्राफ़िक्स में से एक तो मेरे मनो-मस्तिष्क से जाने का नाम ही नहीं लेती जिसमे मूत्र विसर्जन करते कुत्ते के नीचे आमिर की तस्वीर थी! इतनी घृणा !! कहाँ छुपा रखी थी हमने इस भावना को ? कहाँ है मूल इसका ? ऐसा लगा जैसे लोग जूते निकाल कर बैठे हों-कोई गलती करे या करता हुआ लगे, और  उसपर हम   पिल पड़ें। आमिर ने यदि गलती की भी तो  क्या ये  तरीका है प्रतिरोध का? यह तो प्रतिशोध लग रहा था-वो भी किस बात का, यह भी अस्पष्ट है. जब मैंने इसका उत्तर ढूंढने की कोशिश की तो मुझे एक मनोवैज्ञानिक joseph burgo द्वारा लिखित एक आलेख मिला-Celebrities-why We Love and Hate Them. Burgo कहते हैं.

Two powerful psychological forces are at work here — idealization and envy…..we want to believe that some privileged people have perfect lives, full of excitement and without the ordinary pain and frustration we face in our own lives.  On one level, we take vicarious pleasure in their glamorous existence; on another, there’s the secret hope that if those people manage to have a perfect life, it’s always possible that we could eventually have one, too. ……. As times goes on, however, we feel increasingly envious of that perfect life we don’t have. ….a feeling akin to hatred, where the person feeling it wants to spoil the object of envy because to feel so envious is nearly unbearable. ….So because we envy those celebrities with their perfect lives, we take pleasure in their downfall. “If I can’t have a perfect life then I don’t want you to have one either!”

मेरे लिए a feeling akin to hatred- अर्थात ‘लगभग  घृणा जैसी मनोभावना’ प्रसंग की व्याख्या करने वाली मूल स्थापना है. किन्तु क्या यह  सिर्फ सेलिब्रिटीज के प्रति है? मेरे कई मित्र आम वार्तालाप में प्रायः “हम हिन्दू और वो मुसलमान” “हम देशी वो विदेशी”  जैसी भाषा का प्रयोग करते हैं-मानो हिन्दू होना मेरे चुनाव का परिणाम था . मानो भारतीय होना मेरे चुनाव का परिणाम था . ये सारी identities क्या सांयोगिक नहीं है. मेरे हिन्दू होने में कितना मुसलमानपना है किसको पता है. मेरी तथाकथित भारतीय जीवन शैली में कितना विदेशीपना है   किसको पता है. ज्वाला माता  के मंदिर का गुम्बद देखता हूँ तो मुझे ईरान याद आता  है जहाँ के स्थापत्य से गुम्बद निर्माण का ज्ञान आया. एक मंदिर में देवता पर जलेबी चढ़ी देख कर तुर्की याद आ गया  जहाँ से चला जलाबिया हिन्दुस्तान आते आते जलेबी बन गई. हमारे देश की कई महिलाएं यूनान से आई साड़ी और ईरान से आई सलवार पहनती हैं. हमारे जीवन शैली में क्या विशुद्ध अपना है और क्या विदेशी, क्या पता. कुछ दिनों पहले मेरे अभिन्न मित्र प्रियरंजन ने  भर्तृहरि के वैराग्य शतक का एक श्लोक साझा किया

यूयं वयं वयं यूयम् इत्यासिन् मतिरावयोः ।

किं जातम् अधुना येन यूयं यूयं वयं वयम् ॥

“ तुम ‘हम’ हैं और  हम ‘तुम’, पहले  तो इस पर हम सब सहमत थे. अब हमें ये  क्या हो गया कि तुम ‘तुम’ हो गए और हम ‘हम’?”

भारत देश की छवि सभ्यताओं के melting pot के रूप रही है जिसने सब  को अपने भीतर स्वांगीकृत, समाहित  कर लिया है. भूमंडलीकरण  के वर्तमान rhetoric के सदियों पहले यजुर्वेद , यत्र विश्वम्  भवत्येकनीड़म (जहां विश्व एक घोसला बन जाता है)- की घोषणा करता है. यही यजुर्वेद अन्यत्र कहता है:

मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।।
अर्थात- सभी मुझे मित्र की निगाह से देखें। मैं सभी को मित्र की निगाह से देखूं। हम सभी एक दूसरे को मित्र की निगाह से देखें।

संभवतः ‘मैं’ और ‘तू’  का द्वैत ही समस्त समस्याओं का उत्स है. मेरी इस उक्ति  को आध्यात्मिक-दार्शनिक अर्थों में न लेकर,  केवल व्यवहारिक अर्थ में भी देखें तभी भी नफरत घाटे का सौदा है. नफरत का उत्तर नफरत तो सिद्धांततः अतार्किक है. प्रख्यात चित्रकार सरदार सोभा सिंह ने कहा था: “खून के धब्बे खून से नहीं मिटाये जा सकते है.” मगर हमने  चिंतकों , विचारकों, मनीषियों की कब सुनी है. हम तो घृणा की आग पर स्वार्थों की रोटी सेंकने वालों की सुनेंगे न ?

. चलते चलते मुनीर नियाजी साहब के अल्फाज पर तवज्जो देने की गुजारिश करता हूँ:

गैर से नफरत जो पाली खर्च खुद पे हो गई

जितने हम थे, हम ने खुद को, उससे आधा कर लिया

अब हमें  आधा जीना  है या पूरा, ये तय करें। क्योंकि जैसा क़ि अंग्रेजी में कहते हैं : choice is yours !!

 

2 thoughts on “गैर से नफरत जो पाली…

  • सत्यदीप

    on

    हर पोस्ट से लगता है सचिन जी, साहू जी की जिह्वा पर सरस्वती बैठी होंगी, जब उन्होंने कहा था ‘सचिन की जिह्वा पर सरस्वती का वास है’

  • Very apt. Powerful expression.

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