कहाँ हो कुसुमाकर?

 

धरती के पास थी

जितनी भी कवितायेँ

एक साथ आ गई याद उसे

वसंत आ गया

 

धरती ने लिखे थे

जितने भी प्रेमपत्र

आकाश को

उन सब को

एक साथ

बैठ गया पढ़ने आकाश

वसंत आ गया

 

धरती ने सिखाये थे

जितने भी गीत

हवाओं को

हवाएँ उन्हें एक स्वर में

गुनगुनाने लगी

वसंत आ गया

 

धरती ने सींचे थे

जितने भी गंध

सब एक साथ

हो गए किशोर

वसंत आ गया

 

शब्द, स्पर्श,

रूप, रस, गंध

मदन के ये पंच शर

एक साथ विद्ध हो गए

मन के फलक पर

वसंत आ गया

 

हमें तुम्हे

लगे या न लगे

हमारे होने की वजह से

या शायद हमारे होने के बावजूद

इस पर्णपाती समय में भी

वसंत आ गया

 

फिर से

हमेशा की तरह

अपने नियत समय पर

वसंत आ गया

वसंत आ गया

गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं ,’ ऋतूनाम कुसुमाकरोस्मि’ ,अर्थात् ऋतुओं में मैं वसंत हूँ। जिस ऋतु का वरण स्वयं कृष्ण  ने किया हो उसकी महत्ता अविवाद्य तो होगी ही। कवियों के भी लाडले इस ऋतु पर असंख्य पंक्तियाँ लिखी गई संसार की लगभग हरेक भाषा में। आलम्बन विभाव  और उददीपन विभाव अभिव्यंजित करता हुआ,  वीरो के वसन्त से ले के भूखों के वसंत तक- कहा गया वसंत के बहाने। पर क्या सचमुच वसंत आ गया? कवियों चिंतकों को हमेशा से शिक़ायत रही है इस बेचारे से।  शायरे आज़म मीर को वसंत में पतझड़ का गुमान होता है:

कबा ए लाला ओ गुल में झलक रही थी खिज़ा

भरी बहार में रोया किये बहार को हम

रघुवीर सहाय लिखते हैं:

वही आदर्श मौसम

और मन में कुछ टूटता-सा :

अनुभव से जानता हूँ कि यह वसंत है

धूमिल कहते हैं:

मेरे लिए वसन्त

बिलों के भुगतान का मौसम है

और यह वक़्त है कि मैं वसूली भी करूँ –

टूटती हुई पत्तियों की उम्र

जाड़े की रात जले कुत्ते का दुस्साहस

वारण्ट के साथ आये अमीन की उतावली

और पड़ौसियों का तिरस्कार

या फिर

उन तमाम लोगों का प्यार

जिनके बीच

मैं अपनी उम्मीद के लिए

अपराधी हूँ

अदम गोंडवी एक निर्दोष प्रश्न पूछते हैं:

घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है

बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है

एक और शायर कहता है:

लाला ओ गुल से खू टपकता है

क्या इसी को बहार कहते हैं

फैज़ साहब को शिकायत है :

न गुल खिले हैं न उनसे मिले हैं न मय पी है

अजीब रंग में अबके बहार गुज़री है

आजकल के वसंत पर राजकुमार  कुम्भज लिखते हैं:

जीवन से गायब

मगर अख़बारों में छप जाता है

छा जाता है खेतों में

आजकल का वसन्त

कुछ इसी तरह आता है

फ़ोन पर बात करता हुआ

एक आदमी

किसी एक गर्म आलिंगन के लिए तरसता है

और तरसते-तरसते ही मर जाता है

कुछ इसी तरह आता है

आजकल का वसन्त!

आलोक  श्रीवास्तव पूछते हैं:

वसंत आया है और मैं उदास हूं

कैसे कहूं कि उदास हैं कोपलें

हवा, घास, धरती और वन उदास हैं

कैसे कहूं ?

सच यही है कि वसन्त सिर्फधरती तो वासंती होती है, हम नही हो पाते , अनछुए रह जाते हैं. गीतों कविताओं चित्रों निबंध की पुस्तकों उत्सवों तक  सिमट है वसन्त .  मन माने या न माने महुआ, सरसों, अलसी , पलाश झूठ नही बोल सकते बशर्ते आप उनकी ज़ुबान समझने  वक़्त निकल पाते हैं. लेकिन शहरातियों की चिंता वाजिब है क्योंकि शहर में न तो सरसों है, न  पलाश, न ही वासंती बयार। कैसे समझे जुबान उनकी? हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा  वसंत आता नही लाया जाता है. यह चित्त की एक दशा है. कुसुमाकर साल के दो  महीनों में  नही होता।  हमेशा होता है वसंत, बस हम उसमे नही होते.

आकंठ  समस्या निमग्न होने के बावजूद जब मुंह से अकारण  निकल जाये सीटी, वसंत वहीँ है

हरे दूब  की शीश पर चमकते ओसकण पर जब ठहर जाये दृष्टि  . वसन्त वहीँ है

वेणुवन से गुज़रती हवाएं पहुँच हमारे कानो तक, वसंत वहीं है

किसी भी रंग के किसी भी फूल की साँसे जब एकाकार  हो जाए हमारी सांसों से

जलते दिए की लौ हमारे भीतर की सोई बाती  जला दे

सघन प्रेम की सान्द्र अनुभूतियाँ संक्रामक हो जाएँ

वसंत वहीँ है , वसंत वहीँ है.

तो चलें  करें स्वागत वसन्त का, क्योंकि बकौल शायर:

न गुलों में अबके शगुफ्तगी, न दिलों में अबके करार है

मगर एहतेराम ए चमन करो,कि बहार अब भी बहार है

क्योंकि, जैसा कि पाब्लो नेरुदा कहते है:

तुम सारे फूलों को काट दो

वसंत को आने से नही रोक सकते

तो चलिए लिली पुलित्ज़र की बात मान लेते हैं जो कहती हैं:

Despite the forecast,

live like its spring.

आजीवन वसन्त की अशेष शुभकामनायें

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