ईद के बहाने

कई  सालों से ईद की छुट्टी के एक दिन पहले मेरा मामूल हो गया  है अपने विद्यार्थिओं  से ईद के बारे में बात करना। अफ़सोस होता है कि वे इस त्यौहार के मिठास से महरूम हैं.   दरअसल  मेरे विद्यार्थियों की भाँति, हममे से कई  लोगों के लिए कुछ त्यौहार सिर्फ कैलेंडर पर दिन मात्र है  जिसका महत्त्व सिर्फ इतना है कि उस दिन  छुट्टी होती है. मुझे इस बात का दुःख  नहीं होता कि हम लोग इन त्योहारों  के बारे में नहीं जानते. मुझे दुःख इस बात  का होता है कि   जिन त्योहारों को हम नहीं मनाते उनके बारे में  जानना भी नहीं चाहते। ( बल्कि कई बार तो ये  भी देखा है कि  जिन त्योहरों को हम मनाते हैं उनके बारे में  भी ठीक से नहीं जानते !!). ये हमारी किस्मत है कि हम एक ऐसे मुल्क में पैदा हुए जहाँ सांझी विरासत की वजह से  सांस्कृतिक समृद्धिकरण (Cultural enrichment) के अवसर सर्वसुलभ हैं जिसका हमें भरपूर उपयोग  करना चाहिए.  मुझे याद आता  है अजमेर के सावित्री कॉलेज का एक प्रोजेक्ट जिसमे साल के हर त्यौहार को सामूहिक रूप से मनाया गया. इस प्रयास के परिणामस्वरूप होने वाले सुखद परिवर्तनों के बारे में इस प्रोजेक्ट में शामिल विद्यार्थी और शिक्षक आज तक चर्चा करते हैं.  काश इस तरह के प्रकल्प हर शिक्षा संस्थान में होते! अनिवार्य नहीं होने के बावजूद कई स्कूलों में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित  किये जा रहे हैं जिसके बारे में जानना अत्यन्त उत्साहवर्धक है.

ईद के अवसर पर  मुझे आज मुंशी प्रेमचंद  की अमर कहानी ‘ईदगाह’ की भी याद आती जिसमे एक बच्चा, जिसे तीन पैसे की ईदी मिलती है,  अपने लिए खिलोने या मिठाइयां  लाने के बजाय अपनी दादी के लिए एक चिमटा लाता है ताकि रोटियां पलटते वक़्त उनकी उँगलियाँ न जलें.   मुझे लगता  है कि  ये कहानी स्कूल के पाठ्यक्रम  मे अवश्य होनी चाहिए ताकि इस देश मे और ‘हामिद’ पैदा हो सकें.

कल मैने अपने बेटे  से पूछा की कल किस बात की छुट्टी है. तो उसने कहा कि  कल  ईद है.  मैने पूछा इस दिन क्या होता है तो उसने कहा इस दिन गले मिलते हैं. मैने सोचा की इसे कैसे पता तो याद आया की उसेक स्कूल मे त्योहारों  के थीम पर एक डांस  हुआ था  जिसमे ईद के दृश्यक्रम में  गले मिलते हुए बच्चे दिखाए गए थे.  वैसे ईद से जुड़ा जो सबसे मशहूर शेर है क़मर बदायूनीं का, वो भी  ईद के इसी छवि को प्रतिपुष्ट करता है:

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले जालिम

रस्मे दुनिया भी है मौका भी है दस्तूर भी है

यह महज संयोग नहीं है नहीं है कि  ईद का काफिया दीद  से मिलता है. क्योंकि ईद है भी दीद  (दर्शन) से जुड़ा हुआ.  हिलाले-ईद (ईद का चाँद) के दर्शन के बिना  तो ईद मुमकिन ही नहीं है  और यदि इस अवसर पर अपनों के दर्शन  न हो तो ईद मुकम्मल ही नहीं है.  पहले चाँद के दर्शन, फिर अपने प्रियजनों के दर्शन- इनके बिना कैसी  ईद?

“कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती

हमको  अगर  मयस्सर जानां  की दीद होती”

या फिर

“यही दिन अहले  दिल के वास्ते  उम्मीद का दिन है

तुम्हारी दीद   का दिन है हमारी ईद का दिन है”

सच मे ईद उम्मीद का दिन है.   उपवास  के बाद के पारण के  दिन की उम्मीद , अभाव के बाद के संपन्नता के दिन.

“ज़हे- किस्मत हिलाले ईद की सूरत नज़र आई

जो थे रमज़ान के बीमार उन सबने शिफा पाई”

पर क्या वास्तव में सबने शिफा पाई भी क्योंकि बकौल दुष्यंत :”जबसे आज़ादी मिली मुल्क में रमज़ान है”. देश के बड़े तबके के लिए ज़िंदगी एक तवील रमज़ान है, ज़िंदगी एक  मुसलसल इंतज़ार है ईद का . जब तक सब के लिए ईदी  मयस्सर न हो तब तक तो हम यही समझेंगे की हमारी नमाज़ क़ुबूल नहीं  हुई.

जब तलक इस मुल्क के मखलूक नाउम्मीद हैं

तब तलक हर जश्न झूठा और झूठी ईद है

वैसे ईद के मौके का उपयोग शायरों ने अपने रूमानी ख्यालात के इज़हार के लिए किया है. उदाहरण  के लिए नोश फरमाएं:

“मेरी  खुशियों से वो रिश्ता है तुम्हारा अब  तक

ईद हो जाए अगर ईद मुबारक कह दो”

चलते चलते एक इल्तिजा आपसे भी:

“उस से मिलना तो उसे ईद मुबारक कहना

ये भी कहना की मेरी ईद मुबारक कर  दे”

 

 

 

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