अर्थ का अवधान दे

मन के भवन में तम सघन

नवज्योति का संधान दे i

हे शारदे!  तू शक्ति दे,

संकल्प दे, शुभ ज्ञान दे II

 

 

अज्ञान के उत्ताप से

अस्तित्व अब निष्प्राण है I

सब राग हैं रूठे हुए

स्वरहीन अब हर गान हैI

हे अम्ब ! तू अवलंब है,

नव चेतना , नव प्राण दे II

मन के भवन में तम सघन …….

 

 

हर ओर बस इक दौड़ है,

जीवन हुआ अभिशप्त  हैI

अतृप्ति के संताप से

ये सभ्यता संतप्त है I

हे भारति!  दुःख दूर हो,

ऐसा विमल विज्ञान दे II

मन के भवन में तम सघन …….

 

 

सुरभारती!  इस विश्व को

संगीत से सप्राण कर I

मधुहासिनी !  हर रुदन में

अपनी अमिय  मुस्कान भर I

वागीश्वरी !  हर शब्द को

तू  अर्थ का अवधान दे II

मन के भवन में तम सघन …….

 

 

 

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